--> गुज़रते मौसम की भी अपनी उदासियाँ होती हैं

गुज़रते मौसम की भी अपनी उदासियाँ होती हैं


सर्दियाँ चली जाती हैं तब बहुत कुछ याद आता है. कितनी कहानियाँ लिखनी थी, सर्दियों की कहानी, दिसम्बर और जनवरी के गुनगुनी धुप की कहानी. ना जाने कितने सारे ड्राफ्ट्स पड़े हैं यूहीं आधे अधूरे से. हर साल अक्टूबर में जब मौसम के बदलने की आहट मिलती है तो सोचता हूँ कितने काम हैं जो इस मौसम में निपटाने हैं. लेकिन देखते देखते फरवरी भी बीत जाती है और सारे काम यूहीं पड़े रहते हैं...फिर से अक्टूबर के इंतजार में..

कुछ काम को लेकर और कुछ दूसरी बातों से मन भारी सा था. दोपहर को कहीं निकलने की चाह थी. घर के पास ही एक पार्क में हम चले आये थे और बस यूहीं टहलते रहे थे. सर्दियों के खत्म होने का एहसास भी उस दिन हुआ था, जब धुप थोड़ी चुभने सी लगी थी और जैकेट उतारना पड़ गया था. 

कितना खूबसूरत मौसम होता है दिसम्बर से लेकर फरवरी तक का...रंगों में घुला..प्यार का मौसम और सुख का मौसम. वैसे गर्मियों से मुझे शिकायत नहीं. उसकी अपनी खूबसूरती है और मैं गर्मियों को भी एन्जॉय करता हूँ लेकिन सर्दियाँ थोड़ी पसंद है, इसलिए इसके जाने पर थोड़ा दुःख तो होता ही है. मालूम है कि ये वापस आएगा, लेकिन बिछड़ने के समय आँखें नम तो हो जाती है न. 


स्कूल के दिनों में किसी दोस्त कि आदत थी कि फरवरी के ढलते दिनों में उदास हो जाना...कि अब फिर से इस मौसम के लिए आठ महीने का इंतजार करना पड़ेगा. अक्सर उसे मैं इस आदत के लिए चिढ़ाया करता था. लेकिन बीते कुछ साल में फरवरी के अंतिम दिनों में थोड़ी उदासी मुझे भी होने लग जाती है... उस वक़्त जब दोस्त को चिढ़ाया करता था तो मुझे मालूम नहीं था कि उसकी ये बीमारी मुझे लग जायेगी. 

अगर याद करूँ तो इस बार की सर्दियाँ पिछले दो तीन सर्दियों के मौसम से बेहतर थी. वजह कई सारे थे, और  इस बात का अनुमान भी मुझे लग गया था कि इस बार की सर्दियाँ बेहतर होंगी, लेकिन घर पर रहने का सुख वाला आलस कह लीजिये या कुछ और कि इस बार सर्दियाँ यूहीं गुज़र गयी बिना कुछ काम निपटाते.

सर्दियों का मौसम मेरे लिए शायद परफेक्ट मौसम है कहानियां या ब्लॉग लिखने के लिए. लेकिन इस बार कुछ भी नहीं लिख पाया. वैसे मैं कोई इम्पोर्टेन्ट लेखक नहीं हूँ कि जिसके नहीं लिख पाने से कुछ असर पड़ेगा, ना ही कोई अच्छा लेखक हूँ कि जिसके कहानियों और पोस्ट को लोग मिस करें...फिर भी, कुछ लिख नहीं पाया इस जाड़े के मौसम में. 

घर के भी कई काम बस ऐसे ही मुल्तबी हो गए और काम काज तो थोड़ा धीमा धीमा सा ही रहा. वैसे एक मशहूर कहावत है न - Time you enjoy wasting, was not wasted. तो इसलिए ज्यादा अफ़सोस भी नहीं करता. 


उस दोपहर भी थोड़ी उदासी तो थी ही, और साथ ही साथ सुबह मुनीर नियाजी साहब की एक नज़्म जो कि मेरे पसंदीदा नज्मों में से है, उसे सुन लिया उन्हीं की जादूभरी आवाज़ में. थोड़ा और बेचैन हो गया था मन. 

जाने क्या बात है इस नज़्म में कि अपनी सी लगती है मुझे. शायद इसलिए कि लगभग हर इंसान के ज़िन्दगी के आसपास ही घुमती है ये नज़्म. 


हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में..... 

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और एक तस्वीर साथी के साथ.. थोड़ी उदासियाँ कम होती हैं जिसके साथ -



COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. हर मौसम का अपना रंग है,
    अब जिसे जो पसंद हो वह चुन ले,
    उसमें रम ले

    बहुत अच्छा किस्सा गोई
    सच मुनीर नियाजी साहब की नज़्म दिल में उतरती है
    प्यार भरा साथ हो तो मौसम के उदासियाँ जीवन को खुशग़वार बना लेती है हरदम, पास नहीं फटकती

    ReplyDelete
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